10.03.2007

गाँधी नहीं रहे


भ्रमित होने की जरूरत नहीं कि कहीं मैंने 2 अक्तूबर को गाँधी जी की पुण्य तिथि तो ना समझ बैठा। पर कल की कुछ घटनाएँ एसी थी कि मैं सोचने पे विवश हो गया कि गाँधी नहीं रहे। आगे कुछ लिखने से पहले मैं यह बता दूँ कि मैं उन लोगों का प्रतिनिधित्व करता हूँ जिन्हें गाँधी की "सत्य के प्रयोग" भी अच्छी लगी थी और आधुनिक "लगे रहो मुन्नाभाई" भी।

हाँ, तो पहली दुःखद घटना की गाँधी जयंती के अवसर पर भी मेरा कार्यालय खुला था। अमेरिका की कंपनियों को लिंकन के भूत को खुश करने की जरूरत ज्यादा है, गाँधी की अहिंसावादी आत्मा तो यूँ भी कुछ बिगाड़ करने से रही। ट्वेन्टी-ट्वेन्टी में भारतीय क्रिकेट टीम के वर्ल्ड कप जीतने की खुशी में कार्यालय की तरफ से बाहर खाने का कार्यक्रम था। तभी एक गुज्जु सहकर्मी ने हमारे कार्यालय के देश-प्रमुख (Country Head) से पूछा कि आने वाले गाँधी जयंती पर छुट्टी दे रहे हो या नहीं। उस पर देश-प्रमुख का जवाब था कि गाँधी शायद गुजरात में बड़े आदमी रहे होंगे पर एसा सभी जगह नहीं। उसकी बातों से सहमत तो नहीं था पर यह सोचकर चुप रहना पड़ा कि यह भी एक दृष्टिकोण है और बहुत हद तक क्षेत्रीयता से भी जुड़ा हुआ है। बंगलौर के कार्यालय में तमिल देश प्रमुख, जिसने आधी जिंदगी विदेशों में गुजारी हो, उसे गाँधी और गाँधीवादी विचारों से क्या लेना देना। जहाँ भारत क्रिकेट टीम के जीत के उपलक्ष्य में पार्टियाँ दी जा रही थी, उस भारत को पाने के लिए संघर्ष करने वालों के लिए सहानूभूति ना रखना गाँधी के नहीं होने का परिचायक सा लगा।

गाँधी जयंती पर शाम तक खबर सुनने को मिली कि कर्नाटका के पदलोलुप मुख्य-मंत्री अपने उस बात से मुकर गये जिसमें भाजपा और जद ’स’ के बीच ट्वेन्टी-ट्वेन्टी की पारी होनी थी। वैसे बचपन में हमेशा हम एसा करते थे कि खुद बैटिंग कर ली और बाद में बालिंग करने से मुकर गये। कौन बेवजह खुद को थकाए। अगर पहले बालिंग करने की नौबत आये तो खेल ही नहीं होने देने की जिद्द पे अड़े होते थे। एसे में यदि येडियुरप्पा ने बचपन की सीख से समझ ना ली तो कुमारास्वामी का क्या दोष। हाँ, पर गाँधी के "सत्य के प्रयोग" की अहमीयत क्या?

कार्यालय से घर लौटा तो कुछ दोस्त आये हुए थे जिनकी छुट्टी थी। मेरे पहुँचते ही उन्होंने कहा कि मछली लायी जाये। मैं काम के बोझ का मारा और ज्यादा बोझ उठाने की स्थिति में नहीं था सो संयुक्त राष्ट्र के अहिंसा दिवस मनाने की बात याद दिलायी। वास्ता दिया अहिंसा का, की शायद मैं बच जाऊँ सारे झमेले से। पर उनमें से एक ने अलग ही पाठ पढ़ा दिया। उसने कहा अगर एक शेर दूसरे शेर को मारे तो वो हिंसा है, शेर यदि बकरी को मारे तो वो नहीं। मैं चुपचाप उसके बातों पर सोचने लगा कि बात तो सही है। हाँ, पर मछली नहीं लायी, क्योंकि जिद्द पे अड़े रहने की अपनी आदत थोड़ी पुरानी है...मानता हूँ अभी गाँधी हैं तो हैं भले ही वो दूसरों के लिए ना रहें।

चिट्ठाजगत चिप्पियाँ: गाँधी, गाँधी-जयंती, आपबीती

5 comments:

Divine India said...

बहुत सही… हमारे लिए अभी-अभी गांधी हैं और मैं तो कहता हूँ कि गांधी हमारे आस-पास रोज़ ही रहते हैं… बस ध्यान से देखने की आवश्यकता है…।

Srijan Shilpi said...

बढ़िया लिख रहे हैं।

रवीन्द्र प्रभात said...

नि: संदेह भावपूर्ण है, अच्छा लिख रहे हैं आप!

Udan Tashtari said...

सही लिखा है.लिखते रहें, शुभकामनायें.

chavannichap said...

बहुत अच्छा लिख रहे हैं आप.