4.04.2006

शिक्षा का उद्देश्य

मैं एक संस्मरण को यहाँ स्थान दे रहा हूँ, जिसने मेरे मस्तिष्क में शिक्षक की छवि को आदर्श रूप प्रदान किया था । यह बात उस समय की है जब मैं सकरी के बगल में सूर्य नारायण सिंह उच्च विद्यालय में आठवीं कक्षा में पढता था ।

संस्कृत के शिक्षक मोहन बाबू काफी कडक प्रकृति के थे, जो शैक्षणिक अनुशासन के पक्षधर थे । उनकी कक्षाओं को छोडना, दु:साहस का कार्य माना जाता था । और कक्षाओं में आने का साहस करना भी असीम शौर्य दर्शाता था । श्लोकों को याद रखने की तपस्या को भंग करना, ब्रह्महत्या के समान थी । आज तक उन्हें किसी को मारते तो देखा नहीं था पर ये धारणा पीढी दर पीढी चली आ रही थी कि उनको नाराज करना ब्रह्मा को कुपित करने के बराबर है ।

वर्ग में आज का दिन फिर से दिल दहलाने वाला था क्योंकि आज मोहन बाबू की कक्षा थी और उन्होंने "सुभाषितानि" शीर्षक काव्यपाठ से श्लोक कंठस्थ कर के आने को कहा था । जो विद्यार्थी जन्म से ही दु:साहसी थे, उन्होंने आने की जहमत नहीं उठायी । बाँकी जो हम जैसे अदने थे वो उनके वर्ग में हमेशा की तरह उपस्थित थे । सुबह से ही कुछ मित्रगण निपुण खबरिये की तरह अध्यापक कक्ष से संपर्क साधे हुये थे और मोहन बाबू के आज स्कूल ना पहुँच पाने की खबर को पुख्ता कर रहे थे । कुछ अपने-अपने इष्ट देव को इस कार्य के लिये राजी कर रहे थे । तभी खबर आयी कि मोहन बाबू अपनी रामप्यारी (सायकल) से अध्यापक कक्ष में प्रवेश पा चुकें हैं । दिल डूब सा गया था । मैं विश्वास के साथ कह सकता हूँ कि अगर मोहन बाबू को बच्चॊं की मनोस्थिति की जरा भी भनक होती तो शायद वो बच्चों का दिल रखने के लिये ही अपनी कक्षा स्थगित कर देते । पर वो भी भगवान तो थे नहीं । सच कहूँ, तो विद्यार्थियों के लिये वो दानव का मानुषिक अवतार थे ।

प्रतिदिन की आठ कक्षाओं में मोहन बाबू की कक्षा सातवीं थी । काफी समय शेष था, सबों के लिये । पर श्लोक थे कि जुबान पे चढते ही ना थे । विनाश काले, विपरीत बुद्धि । हर दो कक्षाओं के बीच का अल्प अवकाश भी मौन के सन्नाटे में व्यतीत हो रहा था । मध्यावकाश में सबों ने अपने अपने स्तर से फैसला लिया और जो दु:स्साहस कर सकते थे वो अपने अपने घर को प्रस्थान कर गये । कुछ बच्चे, जिन्हे या तो दुविधा थी, या फिर फैसला लेने में असमर्थ थे, या जो खुद को सहज स्थिति में पा रहे थे (मेरा मतलब उन विद्यार्थियों से है जिन्होने पाठ कंठस्थ किया था), वे वर्ग में शेष रह गये ।

प्रतीक्षा की घडी समाप्त हुयी । आते ही मोहन बाबू ने अपने खास कडक अंदाज में पूछा कि किन किन बच्चों ने काव्यपाठ याद किया है । बचे हुए १८-२० छात्रों में से केवल चार हाथ ऊपर उठे । मैं भी उनमें से एक भाग्यशाली था । हम चारों के चेहरे पे, कुछ तो गर्व से और कुछ श्रेष्ठता के अहसास से कुटिल मुस्कान छायी हुयी थी । मोहन बाबू के क्रोध की सीमा ना थी । वो बाँकी छात्रों से काफी गुस्साये प्रतीत हो रहे थे और व्यवहार और अनुशासन की बातें बिना रूके बोले चले जा रहे थे । तभी उन्होंने हम श्रेष्ठ चारों को छ्डी खोज कर लाने को कहा ।

हमें जैसे अपनी कठिन तपस्या का फल मिल गया था । खुशी खुशी हम चारो स्कूल से सटी झाडी में से एक जंगली पौधे से कँटीली छ्डी तोड लाये । मोहन बाबू ने व्यवसायिक दक्षता का प्रमाण देते हुये, छ्डी को निराकार भाव से उठाया और हम चारों को उठ कर ब्लैक बोर्ड के पास आने कहा । हम सभी के खुशी का ठिकाना ना था । आखिर हमें तुच्छ भीड से अलग कर सम्मानित किया जा रहा था । मन में लड्डू फूट रहे थे कि आज सबों को मोहन बाबू के हाथॊं पिटता देखूँगा । जैसे ही हम चारों ब्लैक बोर्ड के पास पँहुचे, मास्टर साहब ने हम चारों को हाथ आगे बढाने का आदेश दिया ।

काटो तो खून नहीं वाली स्थिति थी हम चारों की । ये बात गले नहीं उतर रही थी की परिश्रम के पारितोषिक स्वरूप दंड मिलेगा । विरोध करने की क्षमता सपने में भी ना थी । हाथ आगे बढा चुका था और मार खाने से पहले ही आँख में आँसू भर आये थे । तभी मोहन बाबू ने कहा कि उनका काम हमें शिक्षा देने का है और उसे वो हम तक पहुँचा पाये, इसको निश्चित करने के लिये भय का सहारा लेते हैं । ऎसा नहीं था कि दंड देना उनका प्राथमिक कार्य था और उन्हें इसमें आनन्द आता था । उनके अनुसार हमनें कँटीली छ्डी लाकर अपने व्यवहारिकता के अपरिपक्व होने का परिचय दिया था और ऎसे में किताबी ज्ञान के होने का कोई खास महत्व ना था । हमें अपनी गलती का अहसास हो चुका था, और आँख से आँसू का ढलकना भी बंद हो चुका था । औरों की तो बता नहीं सकता, पर मैं दंड के लिये खुद को तैयार कर चुका था । पर मोहन बाबू भी भावना के बहाव में बह चुके थे, और उन्होंने हम चारों को कान पकड कर उठक-बैठक लगाने को कहा और कक्षा को अगले दिन के लिये स्थगित किया ।